कोशा

  • 17 Sep 2020
  • Posted By : Jainism Courses

पाटलीपुत्र नगर की राजनर्तकी कोशा अनुपम रुप , आकर्षक लावण्य और कलाचातुर्य में निपुण थी । इस कोशा गणिका के यहाँ महामात्य शकटाल का ज्येष्ठ पुत्र स्थूलभद्र रहता था । राजनर्तकी कोशा का स्थूलभद्र पर अत्यधिक प्रेम था , परंतु राज्य के षड्यंत्र में पिता की मृत्यु होने पर स्थूलभद्र ने महामात्य का पद तो ठुकरा दिया , पर इससे भी विशेष उसने संसार -व्यवहार से विरक्त होकर आचार्य संभूततविजयजी से दीक्षा ली । दीक्षा के पश्चात् आचार्यश्री ने मुनि स्थूलभद्र सहित चार मुनिराजों को संयम की अग्निपरीक्षा हो ऐसे कठिन स्थलों पर चातुर्मास करने को कहा । सिंह की गुफा में , विषधर सर्प का बिल या बाँबी में और पनिहारियों से घिरे रहते कुँए के किनारे ध्यानमग्न रहकर चातुर्मास करने की तीन मुनिराजों ने अनुमति माँगी । जबकि आर्य स्थूलभद्र मुनि ने कोशा नर्तकी के भवन में कामोत्तेजक आकर्षक चित्रों से सुशोभित चित्रशाला में षड् रस भोजन का आहार करके चार महीनों तक समस्त विकारों से दूर रहकर साधना करने की आचार्य संभूतविजयजी से आज्ञा माँगी ।

आचार्यश्री महाराज ने इसकी अनुमति दी । राजनर्तकी कोशा के वैभवी आवास में चातुर्मास के लिए स्थूलभद्र के आने से कोशा के हृदय में आनंद का ज्वार उमड़ने लगा । स्वयं को त्याग चुके हुए प्राणप्यारे प्रियतम मानो पुनः लौटे न हो ! कोशा ने कला एवं रुप की अभिव्यक्ति में तनिक भी कमी नहीं रखी , किन्तु मुनि स्थूलभद्र की आत्मकला की स्थिर द्युति देखकर कोशा को अपनी कामवासना बालचेष्टाओं के समान प्रतीत होने पर वह क्षमा-याचना करने लगी । मुनि स्थूलभद्र ने उसे आंतरवैभव की भव्यता तथा दिव्यता का प्रतिबोध दिया और कोशा व्रतधारी श्राविका बन गई । चातुर्मास पूरा करके लौट आये हुए मुनि स्थूलभद्र को अत्यधिक मुश्किल कार्य सम्पन्न करने के लिए आचार्य संभूतविजयजी ने " दुष्कर , दुष्कर , दुष्कर " यों तीन बार कहकर धन्यवाद दिया ।

आचार्यश्री ने मुनि स्थूलभद्र को तीन बार " दुष्कर, दुष्कर , दुष्कर " कहा और अन्य तीन शिष्य की जिन्होंने सिंह , दृष्टिविष सर्प या कुएँ के किनारे उपवासपूर्वक चातुर्मास किया था , उन्हें मात्र एक ही बार 
" दुष्कर " कहा । अतः शिष्यों ने अपने गुरु आचार्य संभूतविजयजी से कहा , " मुनि स्थूलभद्र का कार्य दुष्कर-दुष्कर ( महाकठिन ) नहीं , अपिंतु अत्यन्त सहज एवं सुगम है । " इस प्रकार कहकर एक मुनि गुरुआज्ञा की उपेक्षा करके कोशा नर्तकी के यहाँ पहुँचा । कोशा के षड् रस भोजन करवाने एवं आकर्षक वेशभूषा धारण करते ही मुनि मोहित हो गया । कोशा ने उन्हें नेपाल में से अमूल्य रत्नकंबल लाने को कहा । मुनि अनथक परिश्रम तथा तप त्याग का भंग करके नेपाल के नरेश के पास से एक रत्नकंबल माँगकर लाया और कोशा को दिया , तब कोशा ने अपने पैर -पौंछकर कादो-कीचड़वाले गंदे पानी में वह रत्नकंबल फेंक दिया और कहा , " हे मुनि ! तुम्हें इस रत्नकंबल की चिंता हो रही हैं , परंतु उस बात का तनिक भी क्षोभ नहीं होता कि तुमने अत्यंत मूल्यवान ऐसे चारित्र्यरत्न को मलिन कादो-कीचड़ में फेंक दिया । "

कोशा के इस प्रतिबोध से मुनि का कामसंमोह दूर हुआ । वे आचार्यश्री के पास लौट आये और मुनि स्थूलभद्र के कामविजय की प्रशंसा करने लगे ।

चतुर्थ व्रत का नियम धारण करनेवाली राजनर्तकी कोशा के पास राजा किसी पुरुष को आनंदप्रमोद के लिए भेजते तो कोशा उसे आर्य स्थूलभद्र के गुणों की गरिमा सुनाती थी । कोशा को रिझाने या खुश करने आये पाटलीपुत्र के रथकार के पास हस्तलाघव की ऐसी कला थी कि उसने एक के बाद एक बाण चलाकर सरसंधान की श्रेणी रच दी और फिर उन्हें खींचते ही गुच्छें के साथ आम उसके पास आ गये । अत्यंत कठिन कार्य सम्पन्न किया हो ऐसा रथकार को अहंकार हुआ , तब कोशा ने सरसों का ढेंर करके उसमें सुई खोंस कर उस पर कमल के फूल को तरतीब से रखा । फिर उस पर चढ़कर कोशा नृत्य करने लगी । रथकार उसका ऐसा अप्रतिम कौशल देखकर स्तब्ध हो गया । परंतु कोशा ने कहा , " आम के गुच्छ को तोड़ना या सरसों के ढेर पर नाचना दुष्कर नहीं हैं । सही दुष्कर कार्य करने वाले तो मुनि स्थूलभद्र है , जो प्रमदा ( षोड़शी युवती ) के वन में होते हुए भी प्रमादी नहीं हुए । " रथकार का उन्माद और घमंड दोनों पिघल गये और कोशा के उपदेश के फलस्वरुप उसे वैराग्य हो गया ।

अपने संस्कारों से जीवन को धन्य बनानेवाली कोशा और राग के बीच विरागी जीवन जीनेवाले स्थूलभद्र सम्बन्धी जैन साहित्य में कई कथाएँ , रास , फागु , सज्झाय , उपन्यास आदि की रचना हुई है ।

साभार : जिनशासन की कीर्तिगाथा